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मुक्केबाजी के पर्याय बने हैवीवेट चैंपियन मोहम्मद अली ने दुनिया को रोमांचित करने का वादा किया और फिर इसमें सफल भी रहे

दुनिया के लाखों लोगों को प्रेरित किया था मुहम्मद अली किले ने...फिर भी अपने को महान नहीं मानते थे...अश्वेत लोगों के पक्ष में आवाज़ उठाई और अपने उसूलों के लिए ठुकरा दी अमेरिकी सेना की नौकरी

मुक्केबाजी के पर्याय बने हैवीवेट चैंपियन मोहम्मद अली ने दुनिया को रोमांचित करने का वादा किया और फिर इसमें सफल भी रहे

Saturday June 04, 2016 , 8 min Read

महान मुक्केबाज मोहम्मद अली ने 32 साल तक बीमारी से जूझने के बाद 74 साल की उम्र में इस दुनिया को अलविदा कहा। इस हैवीवेट मुक्केबाज ने तीन दशक तक अपने खेल से लोगों को रोमांचित किये रखा और इस दौरान दुनिया में सुखिर्यां बटोरी। उन्हें इस सप्ताह सांस की तकलीफ के कारण एरिजोना के फीनिक्स के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया था। तीन बार के हैवीवेट विश्व चैंपियन सांस की तकलीफ से बेहद कमजोर हो गये थे। विश्व स्तर पर रिंग के अपने कमाल के कारण ही नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों के प्रति अपनी सक्रियता के कारण भी मशहूर रहे अली को पिछले कुछ वर्षों में कई बार अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा था।

उनके मुक्के दमदार होते थे और वे तेजी से प्रतिद्वंद्वी को हतप्रभ करने में माहिर थे। इस हैवीवेट चैंपियन ने अपने काम से दुनिया को रोमांचित करने का वादा किया और फिर वह इसमें सफल भी रहे। यहाँ तक कि जब कई मुक्के खुद सहने का खामियाज़ा वह भुगते रहे थे और बमुश्किल से बात कर पाते थे तब भी वह लोगों को प्रभावित करते थे। वह महानतम थे। वह मुक्केबाजी के पर्याय थे।

अपने करारे मुक्कों के कारण अली ने मुक्केबाजी में अपनी बादशाहत बनाये रखी, लेकिन इस बीच उन्होंने अपने सिर पर भी हजारों मुक्के सहे जिसके कारण बाद में उन्हें बीमारी ने जकड़ दिया। यह 1981 की बात है जब इस बीमारी से उनका मजबूत शरीर कमजोर सा हो गया था। उनकी जादुई आवाज लगभग बंद हो गयी थी। उन्होंने कई ऐतिहासिक मुकाबलों में हैवीवेट चैंपियनशिप जीती और बाद में उनका बचाव किया। उन्होंने अश्वेत लोगों के पक्ष में अपनी आवाज़ उठायी और इस्लाम में विश्वास करने के कारण वियतनाम युद्ध के दौरान सेना में भर्ती होने से इन्कार कर दिया था। बीमारी के बावजूद वह दुनिया भर का दौरा करते रहे।

अपनी आत्मकथा ‘द ग्रेटेस्ट’ में अली ने लिखा कि जब मोटरसाईकिल पर सवार श्वेत लोगों के समूह ने उनके साथ झगड़ा किया तो उन्होंने यह पदक ओहियो नदी में फेंक दिया था। हो सकता है कि यह कहानी मनगढंत हो क्योंकि अली ने बाद में दोस्तों से कहा कि उनका पदक असल में खो गया था। जब वह अपने चरम पर थे, तब उनका कद छह फुट तीन इंच और वजन 210 पाउंड था। उन्होंने इस तरह से अपनी हैवीवेट मुकाबले लड़े जैसे पहले कभी कोई नहीं लड़ा था। उन्होंने खतरनाक सोनी लिस्टन को दो बार धूल चटायी। मजबूत जार्ज फोरमैन को जायरे में हराया और फिलीपीन्स में जो फ्रेजियर से लड़ते हुए मौत के मुंह से वापस लौटे। उन्होंने हर किसी से मुकाबला किया और लाखों डालर बनाये। उनके मुकाबले इतने लोकप्रिय होते थे कि उन्हें ‘जंगल में गड़गड़ाहट’ और ‘मनीला में रोमांच’ जैसे नाम दिये जाते थे। अली हमेशा कहते थे, ‘‘मैं महानतम हूं।’’ और उनसे शायद कुछ ही लोग असहमत रहे होंगे। उनका जन्म कासियस मार्सेलस क्ले के रूप में हुआ था, लेकिन 1964 में लिस्टन को हराकर हैवीवेट खिताब जीतने के बाद उन्होंने यह घोषणा करके मुक्केबाजी जगत को हैरानी में डाल दिया कि वह अश्वेत मुस्लिमों (इस्लामों के देश) के सदस्य हैं और उन्होंने बाद में अपना नाम बदल दिया। दुनिया इसके बाद उन्हें मोहम्मद अली के नाम से ही जानती रही।

अपनी बेबाक टिप्पणियों और 1960 के दशक में अमेरिकी सेना में भर्ती होने से इन्कार करने के बावजूद अली का जादुई प्रभाव लोगों पर बना रहा और उन्होंने जिस किसी भी खेल प्रतियोगिता में हिस्सा लिया, लोगों ने खड़े होकर उनका अभिवादन किया। अली की चार पत्नियां थी। उनकी पहली पत्नी सोंजी रोई थी जिनके साथ उनका साथ केवल दो साल रहा। उन्होंने अपना धर्म बदलने के बाद 17 वर्षीय बेलिंडा बायड से शादी की थी। बेलिंडा से उनके चार बच्चे थे। उनकी तीसरी पत्नी वरोनिका पोर्श थी, जिनसे उनके दो बच्चे थे। अपनी चौथी पत्नी लोनी विलियम्स के साथ मिलकर उन्होंने एक पुत्र को गोद लिया था।

जब कोलकाता को मंत्रमुग्ध कर दिया था जादूगर अली ने महान 

मुक्केबाज मोहम्मद अली का कोलकाता से खास जुड़ाव रहा है और उन्होंने 1990 में क्रिसमस के दौरान यहाँ तीन दिन बिताकर अपने बुद्धि कौशल और जादुई चालों से खेल प्रेमियों को मंत्रमुग्ध कर दिया था। वह मोहम्मडन स्पोर्टिंग के विशेष निमंत्रण पर यहाँ आए थे। क्लब के पूर्व अध्यक्ष सुलेमान खुर्शीद ने पीटीआई से कहा, ‘‘वह यहाँ व्यक्तिगत आमंत्रण पर आये थे और उन्होंने क्लब का दौरा किया। उन्होंने हमें कुछ ट्रिक भी बतायी। मुझे अच्छी तरह से याद है कि वह किस तरह से हवा में तैर जाते थे लेकिन बाद में उन्होंने हमें इस ट्रिक के बारे में बताया। ’’ 

भारतीय फुटबाल टीम के कप्तान शब्बीर अली जो मोहम्मडन स्पोर्टिंग के कोच भी थे, ने भी इस महान मुक्केबाज के साथ अपनी मुलाकात को अपने जीवन का सबसे यादगार पल बताया। उन्होंने कहा, ‘‘वह सदी के सबसे महान खिलाड़ी थे। मैं तुलना नहीं करना चाहता हूँ, लेकिन वह सभी से हटकर थे। वह मितभाषी थे। मैं वास्तव में भाग्यशाली था जो उनसे मिला। ’’

सीनियर मुक्केबाजी अधिकारी असित बनर्जी ने कहा कि अली को भले ही महानतम कहा जाता था, लेकिन वह कभी खुद को बड़ा नहीं मानते थे। बनर्जी ने कोलकाता प्रवास के दौरान उनसे बात की थी। उन्होंने कहा, ‘‘वह मेरी उनसे दूसरी मुलाकात थी और जब मैंने उनसे पूछा कि क्या वह महानतम हैं, तो उन्होंने मुझे डपटा और कहा कि ‘खुदा महानतम है।’

मुक्केबाज़ अली से मिलने की सचिन की तमन्ना रही अधूरी

अली के निधन पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए दिग्गज क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर ने कहा कि उनकी इस महान मुक्केबाज से मिलने की दिली तमन्ना थी जो अब पूरी नहीं हो पाएगी।

तेंदुलकर ने ट्वीट किया, ‘‘बचपन से ही वह मेरे आदर्श थे। मेरी उनसे मिलने की दिली तमन्ना थी, लेकिन अब ऐसा कभी नहीं हो पाएगा।

आरआईपी ‘द ग्रेटेस्ट’। शतरंज के महानायक विश्वनाथन आनंद ने भी उन्हें श्रद्वांजलि दी। उन्होंने अपने ट्विटर पेज पर लिखा, ‘‘खिलाड़ी महत्वकांक्षा से उत्कृष्टता हासिल करते हैं। हम कुछ ऐसे लोगों की तरफ देखते हैं, जो हमें आगे बढ़ने के लिये प्रेरित करते हैं। ऐसा ही एक नाम था मोहम्मद अली। ‘तितली की तरह मंडराओ और मधुमक्खी की तरह डंक मारो’ : योग्य और पर्याप्त शक्तिशाली बनो : वाली बात अब पहले जैसी नहीं रहेगी। श्रद्धासुमन महान मोहम्मद अली। ’’

विजेंदर, मेरीकाम सहित भारतीय खिलाड़ियों ने मोहम्मद अली को याद किया

विजेंदर सिंह और एमसी मेरीकाम से लेकर शिव थापा तक भारतीय मुक्केबाजों ने महान मुक्केबाज मोहम्मद अली के निधन पर आज शोक व्यक्त किया। विजेंदर ने अली के निधन की खबर सुनने के बाद पीटीआई से कहा, ‘‘अली महानतम थे और महान व्यक्ति कभी मरते नहीं। इस खेल के लिये उन्होंने जो कुछ किया, उसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। यहाँ तक कि रिंग के बाहर के अपने कार्यों से भी वह अमर बन गये। उन्होंने कई लोगों के लिये बहुत कुछ किया। ’’

पांच बार की विश्व चैंपियन मेरीकाम ने कहा, ‘‘यह मुक्केबाजी के लिये बहुत बड़ा नुकसान है। मुझे निजी तौर पर नुकसान का अहसास हो रहा है क्योंकि उन्होंने मुझे और मुझ जैसे कई लोगों को प्रेरित किया। उन्हें हमेशा दमदार मुक्केबाज और साथ ही दमखम वाले व्यक्ति के रूप में याद किया जाएगा। यह खेलों के लिये दुखद दिन है। ’’ 

अस्सी के दशक में भारत आये थे अली

 भारतीयों को महान मुक्केबाज मोहम्मद अली के दीदार का मौका 1980 में मिला था जब उनके नुमाइशी मुकाबले को ‘ग्रेटेस्ट टू ग्रेटेस्ट’ कहा गया था चूंकि उसी समय आपातकाल के बाद लोकसभा चुनाव में शर्मनाक हार झेलने वाली इंदिरा गांधी सत्ता में लौटी थी लिहाजा दूसरा ग्रेटेस्ट शब्द उनके लिये इस्तेमाल किया गया था ।

अली ने दिल्ली, मुंबई और चेन्नई में नुमाइशी मुकाबले खेले जब वह लंदन स्थित एनआरआई उद्योगपति लार्ड स्वराज पॉल के बुलावे पर आये थे । लार्ड पॉल ने उन्हें श्रृद्धांजलि देते हुए आज कहा ,‘‘ वह सही मायने में लीजैंड थे । भारत में दर्शक उन्हें देखकर रोमांचित हो उठे थे ।’’ आम दर्शकों से ज्यादा रोमांचित मुक्केबाज थे । उनमें से एक तमिलनाडु के रेंडोल्फ पीटर्स थे जिन्हें अली के साथ खेलने का मौका मिला था ।

पीटर्स ने कहा कि उन्हें आज तक याद है, जब उन्हें छद्म मुक्केबाजी के लिये कहा तो अली के चेहरे पर अचरज था । उन्होंने कहा ,‘‘ मैं उस समय रेलवे का फेदरवेट चैम्पियन था । पच्चीस बरस का था और मुझे अच्छे से यादव है कि हमने एक के बाद एक उनसे हाथ मिलाये थे । जब मेरी बारी आई तो मैने उनसे छद्म मुक्केबाजी के एक सत्र का अनुरोध किया । वह हैरान रह गए और कहा कि तुम इतने छोटे से और मुझसे लड़ना चाहते हो । मैं एक हुक में तुम्हे स्टेडियम से बाहर फेंक दूंगा ।’’ उन्होंने कहा ,‘‘ मैं मुस्कुरा दिया । नुमाइशी मुकाबले के बाद उन्होंने मजे के लिये कुछ स्थानीय मुक्केबाजों को बुलाया । मुझे भी बुलाया और मेरी इच्छा पूरी की । बाद में मुझे अपने दस्ताने भी दिये जो मेरे पास आज भी है ।’’(पीटीआई)