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संसद सदस्यों के पास गिरफ्तारी को लेकर क्या विशेषाधिकार होते हैं?

संसद सत्र चलने के दौरान विपक्षी राजनीतिक दलों के नेताओं को केंद्रीय एजेंसियों द्वारा नोटिस दिए जाने, उन्हें पूछताछ के लिए बुलाए जाने या गिरफ्तार किए जाने के मामलों में राजनीतिक दल लोकसभा और राज्यसभा के सदस्य सदन के अध्यक्ष या सभापति के सामने ऐसे मामले उठाते रहते हैं.

संसद सदस्यों के पास गिरफ्तारी को लेकर क्या विशेषाधिकार होते हैं?

Friday August 05, 2022 , 3 min Read

राज्यसभा के सभापति एम वेंकैया नायडू ने शुक्रवार को कहा कि उच्च सदन के सदस्यों को सिविल मामलों में जरूर कुछ विशेषाधिकार मिले हुए हैं लेकिन आपराधिक मामलों में उनके पास ऐसा कोई विशेषाधिकार नहीं है.

दरअसल, संसद सत्र चलने के दौरान विपक्षी राजनीतिक दलों के नेताओं को केंद्रीय एजेंसियों द्वारा नोटिस दिए जाने, उन्हें पूछताछ के लिए बुलाए जाने या गिरफ्तार किए जाने के मामलों में राजनीतिक दल लोकसभा और राज्यसभा के सदस्य सदन के अध्यक्ष या सभापति के सामने ऐसे मामले उठाते रहते हैं. वे उनसे दखल देने की भी मांग करते हैं.

ऐसे में यह जानना जरूरी हो जाता है कि क्या संसद सदस्यों के पास कौन से विशेषाधिकार होते हैं और वे किन परिस्थितियों में लागू होती हैं.

क्या कहता है संविधान?

संविधान के 105वें अनुच्छेद के मुताबिक संसद सदस्यों को कुछ विशेषाधिकार हैं. इनमें एक विशेषाधिकार यह है कि सत्र के आरंभ होने या समिति की बैठकों में शामिल होने के 40 दिन पहले और इसके समाप्त होने के 40 दिनों के भीतर किसी भी संसद सदस्य को सिविल मामले में गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है. इसका उल्लेख सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 135 के सेक्शन ‘‘ए’’ में भी है.

आपराधिक मामलों में सांसद आम नागरिक के समान

हालांकि आपराधिक मामलों में सांसद किसी आम नागरिक से अलग नहीं हैं. इसका मतलब यह है सत्र के दौरान या वैसे भी, सांसदों के पास गिरफ्तार होने से बचने का कोई विशेषाधिकार नहीं है.

क्या संसद में गिरफ्तारी हो सकती है?

न तो किसी सदस्य या और न ही किसी अजनबी को संसद के दोनों सदनों में से किसी सभापति/अध्यक्ष की पूर्व अनुमति के बिना सदन के परिसर के भीतर गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है. ऐसी गिरफ्तारियों के संबंध में गृह मंत्रालय द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना होता है.

इसके साथ ही सभापति/अध्यक्ष की पूर्व अनुमति प्राप्त किए बिना कोई भी कानूनी प्रक्रिया, दीवानी या आपराधिक, सदन के परिसर के भीतर नहीं की जा सकती है. इस नियम का पालन करने के लिए यह जरूरी नहीं है कि संसद का सत्र चल रहा है. संसद का सत्र नहीं चलने की स्थिति में भी इस प्रक्रिया का पालन करना जरूरी है.

पूर्व में स्थापित व्यवस्था?

ऐसे ही एक मामले में वर्ष 1966 में राज्यसभा के तत्कालीन सभापति और उपराष्ट्रपति जाकिर हुसैन ने एक व्यवस्था स्थापिक की थी.

पूर्व उपराष्ट्रपति हुसैन द्वारा दी गई व्यवस्था के अनुसार, जब सत्र चल रहा हो तो सदस्यों को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता लेकिन यह स्वतंत्रता सिर्फ सिविल मामलों में है, आपराधिक कार्रवाइयों में नहीं है.