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जब उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने बोली 22 भारतीय भाषाएं, लोग रह गए हक्के-बक्के

नई दिल्ली में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय मातृ भाषा दिवस समारोह को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने नागरिकों से मातृभाषा को प्रोत्साहित करने की शपथ लेने और अन्य भाषाएं सीखने का आह्वान किया है।

जब उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने बोली 22 भारतीय भाषाएं, लोग रह गए हक्के-बक्के

Friday February 21, 2020 , 4 min Read

नई दिल्ली में गुरुवार को आयोजित अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस समारोह के अवसर पर मातृभाषा के संरक्षण और संवर्धन के महत्व को उजागर करते हुए उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू ने स्वयं 22 भाषाओं में बोल कर सभी को चकित कर दिया। इस अवसर पर उन्होंने नागरिकों का आह्वाहन किया कि वे मातृभाषा को प्रोत्साहित करने की शपथ लें और अन्य भाषाओं को भी सीखें।


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फोटो क्रेडिट: PIB



उपराष्ट्रपति ने भारतीय भाषाओं को प्रोत्साहित करने हेतु एक राष्ट्रीय आंदोलन चलाने का आह्वाहन करते हुए कहा कि जब हम मातृभाषा के संरक्षण की बात करते हैं तो हम वस्तुत: भाषाई और सांस्कृतिक विविधता के संरक्षण और संवर्धन की भी बात करते हैं।


भारतीय भाषाओं को रोज़गार से जोड़ते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि एक स्तर तक के राजकीय पदों में भर्ती के लिए भारतीय भाषाओं का ज्ञान अनिवार्य होना चाहिए। भाषा को समावेशी विकास के लिए आवश्यक बताते हुए उन्होंने कहा कि प्रशासन में स्थानीय भाषा का इस्तेमाल किया जाना चाहिए।


उपराष्ट्रपति ने कहा कि हाई स्कूल तक शिक्षा का माध्यम अनिवार्यतः मातृभाषा होनी चाहिए।


उन्होंने सुप्रीम कोर्ट द्वारा अपने फैसलों की प्रति 6 भाषाओं में उपलब्ध कराए जाने की सराहना की और अपेक्षा की कि अधीनस्थ न्यायालय भी इस दिशा में कार्य करेंगे।


भारत की भाषाई विविधता के संरक्षण की जरूरत पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि मातृभाषा का उत्सव कोई एक दिन का पर्व नहीं होना चाहिए बल्कि लोगों को अपनी मातृभाषा को अपनी रोज़ की जीवनचर्या का अभिन्न अंग बनाना चाहिए।


उन्होंने कहा कि भारत में 19,500 भाषाएं या बोलियां मातृभाषा के रूप में बोली जाती हैं। ये बोलियां हमारे सनातन संस्कारों, सदियों की सभ्यता में विकसित ज्ञान और अनुभव की साक्षी हैं।


उपराष्ट्रपति ने कहा कि वैज्ञानिक संरचना, उच्चारण, सरल लिपि और सहज व्याकरण भारतीय भाषाओं की पहचान रही हैं जिनमें प्राचीन, मध्य कालीन और आधुनिक काल में महान साहित्यिक कृतियों की रचना की गई।


महात्मा गांधी को उद्दृत करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि राष्ट्रपिता का मानना था कि मातृभाषा का तिरस्कार नहीं किया जाना चाहिए।


महात्मा गांधी ने कहा था,

‘‘मैं नहीं चाहता कि मेरा घर चारों ओर से दीवारों से घिरा हो और उसकी खिड़कियां बंद हों। मैं चाहता हूं कि विश्व भर की संस्कृतियां मेरे घर में निर्बाध रूप से बसें लेकिन मैं इसके लिए तैयार नहीं कि वे मेरे पैर उखाड़ दें।”


उन्होंने बताया कि बच्चों को विदेशी भाषाओं में पढ़ाने और बिना समझाए उन्हें रटाने की प्रवृत्ति पर सरदार पटेल ने कहा था कि जब रटने की क्षमता बढ़ती है तो समझने की क्षमता कम होती है। उपराष्ट्रपति ने नागपुर विश्विद्यालय में सरदार पटेल के दीक्षांत भाषण को उद्धरित किया जिसमें उन्होंने कहा था कि आपके विश्वविद्यालय ने दिखा दिया है कि जहां चाह वहां राह। मुझे आशा है कि आप अपने इस सुविचारित कार्यक्रम का प्रतिबद्धता के साथ पालन भी करेंगे और पाएंगे कि जब विद्यार्थियों को भारतीय भाषाओं में पढ़ाया जाएगा तो उससे विद्यार्थियों के समय की बचत भी होगी, उनकी समझ विकसित होगी और बुद्धि तीव्र होगी।


उपराष्ट्रपति ने कहा कि भाषा मानव विकास के साथ विकसित होती है और प्रयोग के साथ ही जीवंतता पाती है, अगर आप भाषा का प्रयोग नहीं करेंगे, वो लुप्त हो जाएगी। एक भाषा के साथ एक ज्ञान परम्परा का भी लोप होता है।


इस अवसर पर उपराष्ट्रपति ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा 21 फरवरी को देश भर के एक लाख विद्यालयों में अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मानने की पहल की सराहना की।


इससे पूर्व उपराष्ट्रपति जी के आगमन पर पारंपरिक भारतीय परिधानों में सज्जित विद्यार्थियों द्वारा 22 भारतीय भाषाओं में उनका स्वागत किया गया जो भारत की भाषाई विविधता को दर्शाता है। उन्होंने विभिन्न सरकारी संस्थाओं द्वारा लगाए गए पुस्तक स्टालों को भी देखा।


इस अवसर पर मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक, संस्कृति राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) प्रहलाद सिंह पटेल, मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री संजय धोत्रे, उपराष्ट्रपति के सचिव डॉ. आई वी सुब्बा राव, उच्च शिक्षा सचिव अमित खरे तथा संस्कृति मंत्रालय के सचिव योगेन्द्र त्रिपाठी भी उपस्थित रहे।


(सौजन्य से: PIB_Delhi)